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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 5, अंक 103, फरवरी(द्वितीय), 2021

न जाने क्यूँ

वेद प्रकाश गुप्ता

1. बिखर रहे परिवार अपनो से न जाने क्यूँ । 2. सिमट रहे अपने ही तक ये न जाने क्यूँ । 3. इतनी हुई अधूरी ख्वाईश न जाने क्यूँ । 4. जिसके लिये बिखर रहे सब न जाने क्यूँ ।

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