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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 5, अंक 103, फरवरी(द्वितीय), 2021

तवज्जो मिल रही है तीरगी को

श्लेष चन्द्राकर

तवज्जो मिल रही है तीरगी को नज़र किसकी लगी है रौशनी को बहुत कम लोग मिलते हैं जहां में जो समझे हर किसी की बेबसी को किसी के काम आने के लिए ही मिली है ज़िंदगी ये आदमी को दिखावा दिल नहीं है जीत पाता मिली इज़्ज़त हमेशा सादगी को यहाँ हालात से जो हार माने वही तैयार होता खुदकुशी को बिखेरेगी महक खिलकर जहां में न तोड़ो भूलकर कच्ची कली को हमारे दिल को जो छूकर के गुज़रे मिलेगी दाद ऐसी शाइरी को

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