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Sahityasudha
वर्ष: 5, अंक 103, फरवरी(द्वितीय), 2021

कोरोना

आकाश महेशपुरी

कोरोना से भी अधिक, घातक थी वह भूख। जिसके कारण राह में, प्राण रहे थे सूख।। सभी घरों में बंद थे, थी दुनिया बेहाल। कोई भूलेगा नहीं, मौतों का यह साल।। वे भी तब आये नहीं, अपने थे जो खास। कोरोना लेकर भला, कैसे आते पास।। याद करेगा देश यह, सरकारों की भूल। मदिरालय को छूट थी, बंद रहे स्कूल।। रोज़ी-रोटी ना बची, बचे नहीं व्यापार। कोरोना ने रोक दी, दुनिया की रफ्तार।। कोरोना से मुक्त है, गज भर नहीं जमीन। जाने कैसी त्रासदी, लेकर आया चीन।। रात अमावस की तरह, फैल रहा यह रोग। मौत खड़ी है सामने, सजग नहीं हैं लोग।।

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