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Sahityasudha
वर्ष: 5, अंक 103, फरवरी(द्वितीय), 2021

गजल

विद्या शंकर विद्यार्थी

साथ अब ना रहब कहत बानी बात अब ना सहब कहत बानी फेर लागल तवन हटल नइखे हाथ अब ना धरब बहत बानी घाट अब ना मिली त का होई पास अब ना सटब बहत बानी लोर में डूब के सथा गइलीं तीर अब लाग के रहत बानी पेट के आग बा कि जाई ना काट अब लाफ के रहत बानी।

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