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Sahityasudha
वर्ष: 5, अंक 103, फरवरी(द्वितीय), 2021

होली का त्योहार

डॉ राकेश चक्र

नई उमंगें भर रहा, होली का त्योहार। बाँछें बच्चों की खिलीं , मन में रंग फुहार।। गुझियां, पापड़ बन गए, बने कई पकवान। रसगुल्ला, चमचम बनीं, सजीं नई दूकान।। मनभावन पिचकारियाँ, मन में भरें तरंग। रंगों में सब रँग रहे, करें खेल हुड़दंग।। भर गुब्बारे मारते, नन्हें - मुन्ने बाल। लगे निशाना प्रेम का, पीटें हँस - हँस ताल।। कोई गालों पर मले ; रंग, अबीर, गुलाल। प्रेम, प्रीत में सब रँगे, प्यारे बाल गुपाल।। तन - मन भीगा रँग गए , सब ही प्रियतम मीत। रँगों के त्योहार में, हुई सभी की जीत।। गले मिले सब प्रेम से, मलते प्रेम गुलाल। मुख जोकर से सज गए, होली हुई कमाल।। गुझिया, रसगुल्ला उड़े , खाई पूड़ी खीर। खुशियों में सब रम गए , बन गए आज अमीर।।

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