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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 79, फरवरी(द्वितीय), 2020

कर्ज या फर्ज

राजीव कुमार

बचपन में लुका-छुप्पी खेलते वक्त महेष के पकड़े जाने पर गणेष उसकी कान ऐंठ कर कहता ’’ तुमको छुपने के लिए मेरा ही धर क्यांे मिलता है? मम्मी देख लेगी तो पढ़ने बिठा देगी।’’ चोर-सिपाही के खेल में भी महेश अक्सर चोर बनता और गणेश सिपाही। साल भर की मस्ती करने के बाद रिजल्ट वाले दिन गणेश की कुटाई होती और महेश की वाह-वाही। बचपन के बिछड़े दोस्त आज मिले भी तो इस हालात में, इस दुविधा में कि पहले फर्ज या पहले दोस्ती।

आज एक दोस्त की आँखों में डर है और एक दोस्त की आँखों में तरस। अपने कांपते हुए हाथों से हथकड़ी पहनाते वक्त गणेश ने कहा ’’ साॅरी महेश, पहले फर्ज फिर दोस्ती।’’


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