मुखपृष्ठ
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 79, फरवरी(द्वितीय), 2020

श्वेत सुंदरी

जनकदेव जनक

मैं जब भी बाजार जाता, अपने मित्र श्याम नारायण पांडेय की जनरल दुकान पर अवश्य बैठता. शाम होते ही गांव जवार के लोग बाजार में पहुंचते थे. थोडी देर में ही अच्छी खासी भीड़ हो जाती. कुछ मित्रों से भेंट मुलाकात हो भी जाती थी.

पांडेय जी साहित्यिक व्यक्ति थे. अक्सर उनकी दुकान पर विद्वानों की जुटान होती थी. विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित कथा, कहानी, कविता, लेख, आलेख, साक्षात्कार, परिचर्चा और संगोष्ठियों पर चर्चा होती रहती थी. वहां आने वालों में प्रो. शिवजन्म पांडेय भी हुआ करते थे. वे जब भी आते पांडेय जी के कान के पास अपना मुंह सटाकर कहते, “ मेरे लिए श्वेत सुंदरी का प्रबंध कर दीजिएगा. बाजार कर लौटता हूं तो साथ में लेते जाऊंगा.”

इतना कहने के बाद वे बाजार में खरीदारी करने निकल जाते थे. उस दिन भी उन्होंने पांडेय जी से यही बात दुहराई थी. एक घंटा बाद वे झोला में आलू,प्याज, टमाटर, गोभी, धनिया पता आदि लेकर लौटे और पांडेय जी से अपने सामान का तगादा किया. तब अचानक श्यामनारायण पांडेय चौके. कहा,

“ गुरुवर आपकी फरमाईश तो पूरी नहीं कर सका. धैर्य रखें. आपका सामान आपके दलान पर पहुंच जाएगा.” इस आश्वासन के बाद वे चले गए.

मैंने उनकी बातों पर कभी गौर नहीं किया था. लेकिन उस दिन प्रोफेसर साहब की व्यग्रता को देखकर हैरान रह गया. सोचने लगा कि ‘श्वेत सुंदरी ’ पांडेय जी कहां से मंगवाएंगे! क्या दोनों खूब सूरत लड़कियों की तिजारत करते हैं ? यह तो सबसे अमर्यादित बात है. उनकी बातों ने मेरे अंत:करण में हलचल सी पैदाकर दी थी. सोच रहा था कि ये दोनों समाज के अग्रणीय और सम्मानित व्यक्ति है. गांव के सभी समुदाय के लोग उनका इज्जत-सत्कार करते है. शादी- विवाह और पर्व-त्योहारों के मौके पर उन्हें बुलाते है. जब लोगों को दोनों की असलियत मालूम होगी तो कितनी भद्द पिटेगी. यह सोच- सोचकर मेरा मन दोनों के प्रति घृणा से भर उठा. मेरे मन ने कहा कि इस दुकान पर बैठना अपनी प्रतिष्ठा गंवाने के बराबर है. उठ कर वहां से जाने लगा तो पांडेय जी ने टोका और ठहरने का आग्रह किया. उनके आग्रह से मेरे अंदर की ज्वाला और भभक उठी और आक्रोश में बोल पड़ा,

‘‘ श्वेत सुंदरी के चक्कर में एक दिन आप दोनों मुझे भी जेल साथ ले जाएंगे.....’’

मेरी बातों को सुनकर पांडेय जी जोर जोर से ठहाका मार कर हंसने लगे और दुकान से बाहर निकले. मुझे अपनी अंकवाडी में पकड़े हुए पास की एक दुकान पर ले गये, जहां अंडा बिक रहा था और दुकानदार से कहा,

“ भई, एक दर्जन श्वेत सुंदरी देना! ”

दुकानदार उनकी कोड भाषा को समझते हुए तुरंत एक ठोंगा में एक दर्जन अंडा भर कर दे दिया. यह देखकर मेरे चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगी. ॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰


कृपया रचनाकार को मेल भेज कर अपने विचारों से अवगत करायें