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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 79, फरवरी(द्वितीय), 2020

सुशील यादव के सामयिक दोहे

सुशील यादव दुर्ग

अपनी नीयत साफ है ,तेरी तू ही जान देने वाला भी दे गया ,तम्बू से वरदान बात पते की कह रहा ,सुनो लगा के कान निपट गया आराम से ,राम -नाम तूफान छूट गई जो तीर सी ,बातें विषम कमान अब लौटाना वज्र का , खेद नहीं आसान संकट विपदा त्रासदी,सबका एक निदान भक्तो भगवा ओढ़ लो,मोदीमय हो ध्यान काटों जैसा चुभ रहा , साधा हुआ कटाक्ष आसान नही है फेरना ,शांत (स्व)भाव रुद्राक्ष

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