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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 79, फरवरी(द्वितीय), 2020

पंखुड़ियों के रंग

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

पुष्प पुंज रखता सदा, पंखुड़ियों को जोड़। कभी सुमन की पाँखुरी, चटका कर मत तोड़।। -- पर्यावरण सुधारना, मानव का दायित्व। बिना पाँखुरी के नहीं, पंछी का अस्तित्व।। -- पंखुड़ियों को देखकर, भ्रमर करें गुंजार। करती कोमल पाँखुरी, बिरुओं का शृंगार।। -- खुशी सभी को बाँटता, खिलकर हरसिंगार। पंखुड़ियों में गन्ध का, भरा हुआ भण्डार।। -- चाहे श्रद्धा सुमन हों, या हों गजरे-हार। पंखुड़ियों में निहित है, पावन-निश्छल प्यार।। -- कुदरत का उपहार हैं, पंखुड़ियों के रंग। कलिकाओं के चमन में, अलग-अलग हैं ढंग।।

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