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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 79, फरवरी(द्वितीय), 2020

दोहे रमेश के बसंत पंचमी पर

रमेश शर्मा

(1)
मातु शारदे दीजिए, यही एक वरदान । दोहों पर मेरे करे, जग सारा अभिमान ।।
(2)
मातु शारदे को सुमिर, दोहे रचूँ अनंत । जीवन मे साहित्य का.छाया रहे बसंत ।।
(3)
सरस्वती से हो गया ,तब से रिश्ता खास । बुरे वक्त में जब घिरा,लक्ष्मी रही न पास ।।
(4)
आई है ऋतु प्रेम की,.... . आया है ऋतुराज । बन बैठी है नायिका ,सजधज कुदरत आज ।।
(5)
जिसको देखो कर रहा, हरियाली का अंत । आँखें अपनी मूँद कर, रोये आज बसंत ।।
(6)
पुरवाई सँग झूमती,.. शाखें कर शृंगार । लेती है अँगडाइयाँ ,ज्यों अलबेली नार ।।
(7)
सर्दी-गर्मी मिल गए , बदल गया परिवेश । शीतल मंद सुगंध से, महके सभी "रमेश" ।।
(8)
ज्यों पतझड़ के बाद ही,आता सदा बसंत । त्यों कष्टों के बाद ही,खुशियां मिलें अनंत ।।
(9)
हुआ नहाना ओस में ,...तेरा जब जब रात । कोहरे में लिपटी मिली,तब तब सर्द प्रभात ।।
(10)
कन्याओं का भ्रूण में,..... कर देते हैं अंत । उस घर में आता नही, जल्दी कभी बसंत ।।
(11)
बने शहर के शहर जब, कर जंगल काअंत । खिड़की में आये नजर, हमको आज बसंत॥
(12)
खिलने से पहले जहाँ , किया कली का अंत । वहां कली हर पेड़ की, ...रोये देख बसंत ।।
(13)
फसलें दुल्हन बन गई,मन पुलकित उल्लास । आशा की लेकर किरण, ..आया है मधुमास ।।
(14)
पिया गये परदेश है... ..,आया है मधुमास । दिल की दिल मे रह गये,मेरे सब अहसास ।।

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