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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 79, फरवरी(द्वितीय), 2020

दस दोहे....

मनोज कुमार शुक्ल " मनोज "

भारतीय गणतंत्र का, इकहत्तरवां साल। खुशियों की सौगात से,करता मालामाल।। भारत के गणतंत्र का, करता जग यशगान । जनता के हित साधकर, सबका रखता मान।। सदियों से भारत रहा, ऋषियों का यह देश। मन में बसी सहिष्णुता, कभी न बदला वेश।। भारत ऐसा देश यह ,जग में छवि है नेक । विविध लोग रहते यहाँ, भाषा धर्म अनेक ।। धरती माँ के तुल्य है, सबकी पालनहार । वंदन अभिनंदन करें, और करें जयकार।। जनता तो मिलकर चुने, अपनी ही सरकार । नेतागण निज स्वार्थवश,करते बंटाधार ।। मंदिर में भगवान हैं, बाहर हैं शैतान । मानव खड़ा उदास है,सदियों से हैरान ।। महुआ से लाहन बना, पीते कुछ परिवार । दूरी इससे जब रहे, तो जीना साकार ।। बीहड़ वन में दहकते, जब पलाश के फूल । वासंती ऋतु देखकर, हिय से हटते शूल।। जब आता मधुमास है, मन में उठे तरंग । तन मन खुद ही झूमता, ले हाथों में चंग ।।

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