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वर्ष: 3, अंक 55, फरवरी(द्वितीय) , 2019



दोहे


शुचि 'भवि'


 
1.
कृपा सभी पर कीजिए, ईश हमेशा आप। सद्गुण सबको दीजिये, करे न कोई पाप।।
2.
आन-बान की शान की,एक अलग पहचान। परंपराओं की धरा,'भवि' है राजस्थान।।
3.
दर्पण जैसा मित्र हो,परछाईं सा मीत। धर्मराह हो फिर स्वयं , होगी तेरी जीत।।
4.
कल जो मेरे साथ था, आज हुआ है दूर। सच में होता वक़्त का,बड़ा अजब दस्तूर।।
5.
माना ये सच्चा कथन, वक़्त बड़ा बलवान। लेकिन हिम्मत हारना,कायर की पहचान।।
6.
अंग्रेज़ों की चाल से,फैला ऐसा रोग। भूले अपनी संस्कृति, हम भारत के लोग।।
7.
संवत्सर से ‘भवि’ शुरू,अपना है नववर्ष। एक जनवरी की धमक, है अंग्रेज़ी हर्ष।।
8.
धन-दौलत की है नहीं, भवि मुझको दरकार। सिर्फ़ प्रेम से प्रेम का,मिलता रहे उधार।।
9.
ऐसा भी क्या क्रोध में,कर जाना ‘भवि’ काम। खा जाए जो ज़िंदगी, सारी इज़्ज़त-नाम।।
10.
कर्मों पर ही चल रहा, 'भवि' सारा संसार। थोथी बातों से नहीं ,होगा बेड़ा पार।।

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