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वर्ष: 2, अंक 31,  फरवरी(द्वितीय), 2018



बजट का तराज़ू


राजेन्द्र वर्मा


बजट एक तराज़ू है जिसके एक पलड़े में आमदनी है, तो दूसरे में खर्च । जो पलड़ा भारी, उसके अनुसार जनता का भविष्य! आमदनी-वाला पलड़ा भारी हुआ, तो जनता का साल सुख-चैन से कटेगा । अगर खर्च-वाला पलड़ा भारी है हुआ, तो पिछले साल या उसके पिछले साल वाली योजना भी कश्मीर समस्या की तरह ठंडी पड़ी रहेगी और जनता को आश्वासन के बादलों को घिरते देख ही वर्षा का आनन्द उठाना पड़ेगा ।

जिस प्रकार एक किसान फसल की मड़ाई पर परिवार के खाने-पीने, पहनने-ओढ़ने और शादी-ब्याह के लिए बजट बनाता है, उसी प्रकार सरकार भी बजट भी बनाती है कि साल-भर में कृषि, उद्योग और निर्माण क्षेत्रों में कितना पैसा खर्च किया जाए ! बजट उनके लिए बनता है जो चुनाव में पूँजी लगाते हैं । इसलिए बजट के तराज़ू के एक पलड़े में सरकार पूँजीपतियों की योजनाएँ रखती है और दूसरे पलड़े में गरीबों, किसानों और बेरोजगारों के लिए आश्वासन । इसलिए उसे हर बार यही कहना पड़ता है कि इस वर्ष के बजट का फोकस इसी पर है कि देश का विकास हो, ग़रीबी दूर हो, रोज़गार पैदा हो, कृषि की आमदनी बढ़े । इसके लिए आवश्यक धन की व्यवस्था की गयी है, भले ही राजकोषीय घाटा थोडा और बढ़ा है ।

बजट में दो बातें ख़ास होती है— देश के अन्दरूनी विकास में कितना खर्च हो रहा है और कितना बाहरी विकास में ! अन्दरूनी माने देश के लोगों पर और बाहरी माने पडोसी देशों पर ! देश के लोगों पर विकास कैसा भी हो, चलेगा; लेकिन बाहरी विकास पर सरकार का क्या नियंत्रण ? वर्ल्ड बैंक से पैसा मिला ही इसी शर्त पर है कि उसे कहाँ-कहाँ और कैसे खर्च होना है ! जहाँ तक अन्दरूनी विकास की बात है, सरकार को पता है कि कृषि-प्रधान देश में अब कोई खेती नहीं करना चाहता, क्योंकि इसमें लाभ नहीं है, इसलिए वह ऐसे घाटे वाले धन्धे पर ध्यान ही नहीं देती ।

बजट के हिसाब से काम करने के लिए पैसे की ज़रूरत होती है । खर्च के दस रास्ते हैं, आमदनी के दो ही हैं : टैक्स-सेस और वर्ल्ड बैंक से क़र्ज़! सरकार ने बजट बनाया है- स्वस्थ चित्त से, ख़ूब सोच-समझकर देशवासियों के हित में, किसी कॉर्पोरेट के दबाव के बिना । वित्त मंत्री का यह चौथा बजट है । आदमी पहली बार गच्चा खा सकता है, दूसरी बार चूक हो सकती है, तीसरी बार ग़लती हो सकती है, लेकिन चौथी बार– ग़लती, चूक वगैरह का सवाल ही नहीं ! ‘विंडो ड्रेसिंग’ का लोहालाट इस्तेमाल; इतने हज़ार करोड़ में इतने हज़ार करोड़ तो गरीबों के लिए हैं । भई वाह ! तालियाँ तो बनती हैं न !

सरकार जानती है कि देश के अर्थशास्त्री बजट पर कुछ-न-कुछ कहेंगें ही, इसलिए वह उनकी बातों पर कान ही नहीं देती! उसे पता है कि कौन अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन के कैंप का है और कौन अमेरिकन मॉडल का ? कोई कहेगा कि यह बजट असमानता बढाने वाला और ग़रीब-विरोधी है, तो कोई कहेगा कि यह दिशाहीनता का शिकार है । बहस ख़त्म होने पर सरकार का प्रवक्ता कहेगा कि यह बजट अभूतपूर्व है और जन-पक्षधर है ! उसकी बात निष्कर्ष का ठप्पा बन जायेगी ।

जो भी हो, सरकार चलाना घाटे का सौदा है ! करोड़ों रुपये, जो देश की जी.डी.पी. बढ़ाने के काम आते, चुनाव में स्वाहा हो जाते हैं ! सरकार का जन्म ही घाटे में होता है और घाटे में ही उसकी विदाई होती है । इसलिए बजट घाटे का ही बनेगा ! सत्तर वर्षों से सरकार बजट की खेती ही तो करती आयी है । अमीरों के बजट को ग़रीबों का बजट कहकर वोट बैंक मज़बूत करती है । भाषण की ज़मीन पर वायदों के बीज, सब्सिडी और ब्याज में छूट की खाद डालकर सांसदी और विधायकी की फ़सलें बोती-काटती है ! उसकी खेती में न सूखा पड़ता है और न ही बाढ़ कुछ बहा पाती है ! वह हमेशा फायदे की फ़सल बोती-काटती है ! किसान-मजदूर और बेरोजगार सरकार से जानना चाहते है कि क्या कभी उनके लिए बजट बनेगा या सिर्फ़ बजट की खेती होती रहेगी ? लेकिन सरकार चुप्पी साधे है !


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