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वर्ष: 2, अंक 31,  फरवरी(द्वितीय), 2018



सुबह से शाम


तुलसी देवी तिवारी


उसने खोजी नजर उस चाय की दुकान पर डाली, ’’ मर गये साले सब के सब, ऐसा भी कहीं त्यौहार मनाया जाता है ? सारी दुकाने बंद करके मस्ती करने में लगे हुए हैं, पूरी रात बीत गई हरामखोर हुड़दंगियों को अस्पताल पहुँचाते-पहुँचाते। कम से कम बीस को तो उसने ही पहुँचाया, कितनी भीड़ थी अस्पताल में ओह! अगर हम भी इन्हीं की तरह त्यौहार मनाने लगें तब क्या हो? देखो तो दलिद्दर लोग कैसे सब कुछ गंदा छोड़ कार भागे है ?ं भट्ठी पर कुत्ता सो रहा है , सो ले बेटा, सो ले! तेरा ही तो राज है, यहाँ तो चाय के लिए जी तरस रहा है। वह चाय की तलब से अपने को बेचैन अनुभव करने लगा। वैसे तो कई लोगों से उसकी पहचान थी, किन्तु पुलिस वालों से पहचान कैसी होती है वह अच्छी तरह जानता हैं, एक तो त्यौहार का दिन!ऊपर से सबेरे का समय, ज्यादातर लोग दिन भर के थके देर रात को सोये होंगे, कौन उसे अपने दरवाजे पर देख कर प्रसन्न होगा? उसने मन को मारा । सात बजे होंगे सुबह के, सड़के गलियाँ वीरान थीं, जगह-जगह रंग गुलाल से धरती लाल थी। चैक चैराहों पर होलिका दहन के अवशेष बिखरे पड़े थे। कहीं राख कही,ं सुलगती लकड़ियाँ, कहीं शराब की बोतलें, दो दिन पहले से शराब बंदी है फिर भी न जाने कहाँ से मिल जातीं हैं इतनी बोतलें ? वह धीरे-धीरे टहलता हुआ पूरे मोहल्ले की टोह लेता रहा। नगर निगम के नल में पानी आने लगा था उसने मुँह हाथ धो कर अपनी थकान मिटाने का प्रयास किया। अभी तो वातावरण में शांति छाई हुई थी। नल के पास पड़ी टूटी चूड़ियों से उसे कल का वह भयावह मंजर याद हो आया जिसे देख उसकी बुद्धि चकरा गई थी। रात के करीब दस बजे होंगे, वह माँ भद्रकाली मंदिर के प्रवेश द्वार के पास चबुतरे पर बैठा जरा सा कमर सीधी कर रहा था कि किसी महिला की आवाज उसके कानो से टकराई

’’मोला जान देवा ददा हो तूंहर पां परत हौं ऽ...ऽ!.’’

’’ कतेक मुस्किल म इहाँ तक लाये हन ,छोड़ेच बर ? ऽ,चुपे चुप रहे र ऽ...ऽ.’’ अमरा देबो तोर घर, किल्ली पारबे त नरी मसक देहूँ।’’

’’ मामला संगीन मालूम पड़ता है। उसने तत्काल अपने हेन्ड सेट पर पुलिस कंट्रोल रूम का नंबर डायल किया । वे मोटर साइकिल पर थे दो युवक और एक औरत किसी बात पर उनमें झिकझिक हो रही थी।

’’ तैं एही मेर रव यार! में ऐला ठिहा म अमरा के आवत ह,ँ तिहाँ तोहु ला लेगहूँ!’’ उसकी जबान लड़खड़ा रही थी।

’’ नहीं यार तीनों झि एके संग जाबो बने तो जावत हन।’’

’’ तें समझस नहीं यार ओदे पुलिस वाला हे, तुरंत रोक लिही, अइसे मोर बाई हे कइके लेग जाहं। ’’

’’ अरे किधर जाते हो ? ’’ वह लपकता हुआ उनके पास तक पहुँच गया था।

वे हड़बड़ा गये थे।

’’ कुछू नहीं साहेब एहर अपन मन के हमर संग जावत हे’’ मोटर साईकिल चलाने वाला बोला ं औरत की सिसकियाँ तेज हो गईं

’’अपने से जा रही है तो रो क्यों रही है?’’ उसने कड़क कर पूछा ।

’’ खाबे-पीबे तेला कव साहेब, हमर तिहार झन बिगाड !़’’ पहले वाला ही फिर बोला। वह खुशामदी लहजे में दांत निपोर रहा था। औरत कातर निगाहों से उसे देख रही थी। वह उनके निकट चला गया था। ’’ लाओ दस हजार और जल्दी भागो यहाँ से!’’ वह फुसफुसाया था।

’’ अतेक तो नईं हे साहेब सौ पचास ह बन जाही।’’ उनके पसीना छूटने गला था ठंढी रात।

’’जानते हो कितनी सजा होगी औरत को बुरी नियत से अगवा करने की?’’ वह आराम से गाड़ी का हेंडल पकड़े हुए था इसी बीच उसने गाड़ी बंद कर के चाबी निकाल ली थी। अभी मोल भाव चल ही रहा था कि पुलिस का डग्गा आ गया। अगले पाँच मिनट में उन्हें लेकर पुलिस की गाड़ी जा चुकी थी । वह संतोष की एक अधुरी साँस ले पाया था कि मार-पीट वाले पहुँच गये।

’’ चलो कट गई रात ,बस अब आधे घंटे में उसकी छुट्टी हो जायेगी। उसने एक लंबी गहरी साँस अपने फेफड़े में भरी। पूर्व दिशा की ओर उसकी नजरें उठ गईं। आदित्य अपना सिंदूरी बाना उतार कर सुनहली चदर ओढ़ चुके थे। उसे बहुत अच्छा लगा।

’’ आज तो छुट्टी है यार! सुलोचना कई दिनो से भिड़ी है गुझिये,फाफड़े, सलोनी, नमकिन और न जाने क्या-क्या बनाने में। ड्यूटी की ऐसी मजबूरी कि खाना खाने के लिए भी घर न जा सका। आज तो पुलिस वालों की होली है, पब्लिक से ज्यादा ही धमाल होगा। आई. जी डी.आई.जी. एस. पी. आदि सारे अधिकारी कर्मचारी एक साथ मिल कर होली खेलते हैं। उनकी पत्नियाँ भी आतीं है। सामुदायिक भवन में होली खेलने। सुलोचना को तो पहले ही पकड़ ले जातीं हैं सब। नाचने गाने मंे उसका कोई जवाब जो नहीं है।

आठ बजते ही वह मोटर साइकिल से घर के लिए चल पड़ा। मन में लड्डू फूट रहे थे। वह कार्यक्रम बनाता जा रहा था दिन भर का। स्टाप में सभी एक दूसरे को भइया भाभी कहते हैं आज तो जो मिल जाय रंग दो ! साल भर का भाभी कहना किस दिन काम आयेगा?

घर पहुँच कर नित्य क्रिया से निवृत हो वह अभी नाश्ता ही कर रहा था कि सुलोचना ने बाल्टी भर रंग डाल कर सिर से पाँव तक सराबोर कर दिया। वह कुछ कर पाता इससे पहले ही वाॅशरूम में घुस कर दरवाजा अंदर से बंद कर लिया। लाख प्रयत्न बेकार गये दरवाजा खुलवाने के।

’’अच्छा किया न धोखे से रंग डाल कर ? जब मिलोगी तब बदला लूंगा याद रखना। ’’ वह अंदर से ही...ही......ही..ही..ही करके हँसती रही।

’’घर छोड़ कर कहाँ जायेगी देख लूंगा आगे पीछे ।’’ मन ही मन सोचते हुए उसने अपने कपड़े बदले, सफेद ।कपड़ों पर ही तो रंग दिखते हैं। गुलाल का पाॅली बैग अपने हाथ में लिया, कुछ रंग, पेंट की जेब में रखा और घर से निकल गया। वह रक्षित आरक्षी केन्द्र बेमेतरा की ओर जाने की ही सोच रहा था कि उसकी नजर जगमोहन पांडे पर पड़ गई। वे धुले कपड़े पहने कनपटियों के पास शेष बचे बालों में कंघी किये खरामा खरामा पुलिस लाइन की ओर बढ़ रहे थे।

’’प्रारंभ भइया से ही करता हूँ, एकदम छोटे भाई की तरह मानते हैं ’’प्रताप बच्चों को स्कूल छोड़ दो ! प्रताप मेरी उमर हो गई कुछ करने की हिम्मत नहीं होती कल परेड में जरूर टोकाटाकी हो जायेगी, मेरे जूते ठीक से चमक नहीं रहे हैं। बाबू जरा बरियार हाथ लगा देते तो अच्छा हो जाता । प्रताप! जरा अपनी भौजाई को पिक्चर में बैठा आते, मेरी ड्यूटी है और यह है कि कान खाये जा रही है।’’ वह सोचता बुजुर्ग आदमी हैं चलो कर देते है सेवा । उन्हीं के कारण उसे तंबाखू की डिबिया रखने की जरूरत नहीं पड़ती थी ,जब मन हो मांग लो! नींद से उठ कर भी तंबाखू देने में कभी नहीं चिड़चिड़ाये। वह जरा तेज गति से उनकी ओर बढ़ा।

’’ भइया! आ रहा हूँ ..ऽ ..ऽ .ऽ!’’

’’ अरे नहीं....ऽ ..ऽ .ऽ!’’उनके कदम तेज हो गये ।

यह भी उनके पीछे लपका। वे और तेज हुए। यह भी लगभग दौड़ पड़ा। ’’अरे रुको! भाग क्यों रहे हो आप को खा जाऊँगा क्या?’’ वह जोर से चिल्लाया।’’

’’रंग मत लगाना ! मेरा सिर दर्द होता है ।’’ एक बार पीछे देख कर वे चिल्लाए और घूम कर और तेज भाग चले। सडक़ की दोनो ओर खड़े लोग इस दौड़ में शामिल हो कर चिल्लाने लगे थे।

’’ पांडे जी और तेज ! और तेज! वह आप के पीछे है..ऽ ..ऽ .ऽ!’’

’’ प्रताप ! और तेज! भागने न पायें बूढ़ऊ! लपक लो ..ऽ ..ऽ .ऽ!’’

’’बाप रे! बूरे फंसे..ऽ ..ऽ .ऽ!’’ लेकिन एक बात तो हुई इनकी असलियत का पता चल गया। बूढ़ा हूँ कह-कहकर खूब बेवकूफ़ बनाया इन्होंने। अब देख ही लेता हूँ कहाँ तक दौड़ते हैं, वह और जिद्द में आ गया। सडक के किनारे के दर्शक बदलते गये। सिमगा जाने वाली सड़क पर वे भागे जा रहे थे। ’’ कहीं गिर मत पड़ें बूढ़ऊ’’, वह डर भी रहा था। उसकी साँस धौकनी की तरह चल रही थी। पाँच किलो मीटर से कम क्या दौड़े होंगे अब तक? वह बस एक हाथ की दूरी पर रह गया था उनसे। हाँ ! कहाँ जाओगे बच कर? ये आये हाथ में, बस चार अंगुल की दूरी रह गई। ये क्या बिजली की गति से वे पलटे और उसे कमर से कस कर पकड़ लिया। फिर क्या उठा- उठा कर तीन पटकनियाँ दे दी। उसकी हड्डियाँ चरमराने लगीं । गुलाल का बैग न जाने कहाँ गिर गया, वह रिरियाने लगा। छोड़ दो भइया अब नहीं माँगूंगा तंबाखू । मैं नहीं जानता था कि आदत लगा कर मेरी ये हालत करोगे। ’’

’’ रे पागल, तू तंबाखू मांगने के लिए इतनी दूर दौड़ गया? वे पछतावे में पड़ गये। होली के बिहान के कारण सड़क पर कोई वाहन भी दिखाई नहीं दे रहा था। बड़ी देर बाद एक एंबुलेंस गुजरी, उसे ही रोक कर दोनो पुलिस लाइन आये । पुलिस ग्राउंड में होली का जलसा अपने शबाब पर था। अभी -अर्भी आइ. जी. साहब की मिसेज आईं थी पुलिस बेंड वाले जोर-शोर से बजा रहे थे--

’’ साँची कहें तोरे आवन से हमरे,

अंगना में आई बहार भउजी।

सभा भवन के अन्दर से ढोलक झाँझ मजीरे की आवाज आ रही थी। अवश्य सुलोचना पहुँच चुकी होगी। वह कान देकर उसका स्वर पहचानने का प्रयास कर रहा था कि तब तक दो जवान पांडे जी को पकड़ कर उनकी चिकनी दाढ़ी मंे रेत वाली गुलाल रगड़ने लगे थे। ’’ ’’ठीक हुआ ! बड़े भागने वाले बने थे।’’ उसके कलेजे में ठंढक पहुँचे इसके पहले ही वह भी दो जवानो की गिरफ्त में था। विरोध किया तो शर्ट-पेंट तार-तार हो गये। रंग-अबीर से पूरा ढँक गया वह। कुछ कहता इसके पहले ही वे उसे छोड़ किसी और की ओर बढ़ गये थे।

’’दो तो बज ही गये होंगे चलूँ जरा भाभी से भी मिल लूँ, इन्हें तो अभी एकाध ध्ंाटे फुरसत नहीं मिलेगी। ’’ मैदान में लाइन से लगी कुर्सियों पर लोग बैठे हुए थे, एक खाली कुर्सी पर जगमोहन पांडे बैठ गये थे। इनका बदला उनसे लेेता हूँ।’’सोचता हुआ वह सबकी बेख्याली का लाभ उठा कर ग्राउंड से बाहर आ गया। सड़क पर भी कुछ लोग पानी कीचड़ गोबर आदि से त्यौहार मना रहे थे। लगा कि किसी ने पहचाना नहीं उसे। पांडे जी के घर का दरवाजा उढ़का हुआ था। घर के अंदर से मालपुए सिंकने की मीठी-मीठी मनभावनी सुगंध ने याद दिलाया कि उसे जोर की भूख लगी है। भाभी- भाभी पुकारता वह अन्दर घुस गया। ’’अरे ! आप तो चिन्हा ही नहीं रहे है !ं’’ उन्होंने संशय पूर्ण निगाहों से उसे देखा।

’’ देखिये अभी कुछ डालियेगा नही!ं कड़ाही चढ़ी है ।’’ कहती हुई वह वाॅशरूम में घुस गईं।

’’ नहीं कुछ नहीं लाया, आप चिन्ता न करें !’’ कहते हुए अपने पीछे आते देख कर वे कछुए की तरह अपने सारे अंग घुटनो के बीच समेट, सिर को आँचल से अच्छी प्रकार ढाँक कर बैठ गईं उसे अपने निकट आया देख सिर भी घुटनो के बीच कर लिया। उसने बड़े आराम से जेब से पक्का चूड़ी रंग निकाला और उनके सिर पर पूरा पैकेट खाली कर दिया । उसके बाद आंगन में बनी टंकी से एक बाल्टी पानी निकाल कर उनके ऊपर उड़ेल दिया। वे कुनमुनाईं, उन्हें गीले कपड़ों मे देखने की दबी-हुई इच्छा लिए एक पल वह वहाँ रुका था तब तक पांडे जी का बेटा न जाने कहाँ से दौड़ा-दौड़ा आया और उसके ऊपर फिनायल की पूरी बोतल उड़ेल कर तेजी से बाहर भाग गया।

’’ ये क्या डाल दिया रे झिरकुट? मारे बिना छोड़ूंगा नहीं ! ’’ वह हवा की तरह उसके पीछे भागा।

’’ वह तो गधे के सिर से सिंग की तरह गायब हो गया था। अपना घर देखा तो ताला बंद था। फिनायल की तीखी गंध से उसका सिर चकराने लगा था।

’’एक नंबर का हराम खोर है। साला पूरा बाप पर गया है। अगर भाभी का मोह न होता तो इनके दरवाजे पेशाब करने भी न आता।’’ वह मन ही मन बड़बड़ाता ग्राउंड की ओर लौट गया। वहाँ अब होली के गीतों पर डांस हो रहा था। देखने वाले तालियाँ बजा रहे थे। भांग के ड्रम के पास बहुत भीड़ लगी थी। उसने गुस्से-गुस्से में बिना गिने कई गिलास खाली किये तब कहीं जाकर मूड होलियाना बना। वह भी नाचने वालों में शामिल हो गया लेकिन एक बात उसकी समझ में नहीं आई कि नाचने वाले नाक बंद करके उससे दूर क्यों हुए जा रहे हैं ?

’’ क्या लगा लिए जवान? एस.पी. साहब पूछ बैठे थे।

’’ओ मेरा भतीजा झिरकुट ! बहुत बदमाश है सर!’’ नजरें झुकाये वह उनसे दूर चला गया था।

’’ अरे बजाओ! भई बाजा! क्यों रोक दिया ऐंऽ? चलो बजाओ! ’’ उसकी जबान लड़खड़ा रही थी।

’’ चलो प्रताप! अब नहाते हैं सब लोग चले गये। ’’ जगमोहन पांडे की आवाज उसने पहचान ली । एकदम भूत बने हुए थे।

’’ नहीं! अभी तो मैं नाचूंगा!’’

उसने अपनी बाँह छुड़ाने का प्रयास किया।

’’छुड़ा लोगे क्या ? साले मरते तक भांग पी लिया अब होश कहाँ से रहे?’’

’’ चल रहा हूँ भइया छोड़ो नऽ!’’ उसने पूरा बल लगा कर खुद को छुड़ाया।

सब चले गये तब भी वह इमली की छाया में बैठा रहा ’’ सुलोचना को जरा भी उसकी फिक्र होती तो इतनी देर तक यहाँ न बैठी होती , जानती है मैं कल रात से भूखा हूँ, ठीक है थोड़ा और इंतजार कर लो! भाभी भी तो औरत ही हंै कैसे घर में काम कर रही हंै , ये तो लता मंगेशकर हैं नऽ!’’ मन की भड़ास निकालता रहा वह। जब शाम घिरने लगी तब वह घर की ओर चला।

दरवाजे पर सुलोचना खड़ी थी, पक्का उसी का इंतजार कर रही थी। वह नहा धो चुकी थी, रंग अभी पूरे नहीं छुटे थे चेहरे पर विचित्र सी चित्रकारी नजर आ रही थी । वह बस थोड़ी ही दूर रह गया था कि रंग से सराबोर एक आदमी आया और सुलोचना के सिर पर अबीर की पन्नी उलट दी वह उसके चेहरे पर गुलाल मलने लगा।

’’ अरे !हटो- हटो मैं नहा चुकी हूँ, दिखाई नहीं देता क्या?’’ उसने पुरे बल से नशे में चूर उस सींक से पतले आदमी को दूर फेंक दिया और अपना चेहरा साफ करने का असफल प्रयास करने लगी।

क्रोध से उसकी कनपटियाँ जलने लगीं ’’ पति के लिए दरवाजा बंद और दूसरों के लिए अजंता की मूरत बनी खड़ी हंै।’’

’’ कौन है बे ? ऐसे ही लगाया जाता है महिलाओं को रंग?’’ उसने उसे कमर से पकड़ लिया और सडक के सामान्तर बहने वाली बड़ी नाली कीे ओर ले चला जिसे कल से ही कुछ होलियारों न बांध कर नाली का पानी एकत्र कर रखा था।

’’ में नोहर सिंग हौं भइया, सालो साल तूंहर घर-बाहिर सफाई करथौं अतका हक तो हे न मोर?’’उसकी आँखें नशे के खुमार के कारण मूंदी जा रहीं थीं, जबान लड़खड़ा रही थी।

’’ले नऽ! भाभी च काबर? भइयो संग होली खेले के पूरा हक हे तोला।’’उसने उसे पूरा का पूरा नाली में उतार दिया।

’’ सुबह से शाम हो गई दस मिनट भी रहे घर में ? ऐसा ही आदमी लिखा था करम में, बैठ कर काट दिया होगा भाभी के पास। न जाने कौन सी बात है जो कभी खत्म होने का नाम ही नहीं लेती।’’ उल्टे बाँस बरेली जाते देख वह चुप चाप वाॅश रूम में घुस गया।


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