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वर्ष: 2, अंक 31, फरवरी(द्वितीय), 2018



ऋतुराज पर हाइकु


पुष्पा मेहरा


       
                                      
  १.
खोले किवाड़ 
सूरज ने अपने
झाँकी है धूप |
  २. 
हर्षित नभ 
फूलों की घाटियों में 
पुलक भरा |
  ३. 
भौरों की टोली 
पी-पी फूलों का रस 
मद से भरी |
  ४. 
धरा बिछाए 
हरियाला गलीचा 
सुस्ताती धूप |
  ५.
फूली सरसों 
झूम रही बालियाँ 
हैं रोमांचित |
  ६.
भीनी सुगंध 
भिगोए अंग-अंग 
गेंदा नवेला | 
  ७. 
धरा रूपसी 
ओढ़े पीली चुनरी 
रीझी तितली |
  ८. 
काम को देख 
हवा रचती छंद 
कोयल गाए |
  ९.
आम्र विटप 
बौरों के तीर लिए 
हवा से खेलें |
  १०.
बसन्त आया  
कोहरा पट खोल 
रवि मुस्काया |
  ११. 
बुझे अलाव 
फाग के स्वागत में  
फूला पलाश |
  १२. 
सेमल जगा 
हाथों हाथ सँभाले 
मृदु कलियाँ |
  १३.
नाचें तितली 
ओढ़ रँगी चुनरी 
मधु घट पे |
  १४. 
बहुरे पाखी 
हँसे कमल दल 
झूमे भ्रमर |
  १५.
गूँजा गगन 
हर्षाते उड़ छाए 
प्रवासी पाखी |
  १६. 
महका माघ 
आया संक्रान्ति काल 
भागती शीत | 
  १७.
सूर्य किरणें 
हँस-हँस सजातीं
धरा की वेणी |
  १८. 
मन-आँगन 
खुशबुएँ के डेरे 
भावों से खेलें |
  १९. 
आया बसंत 
पुरा ना सूनापन 
धरती माँ का |
  २०. 
रो रहा माली 
उजड़ा है बागीचा
दिखें ना पाखी |
  २१.
अशक्त नदी 
रेत से घिरी हुई 
उसाँसें लेती | 
  २२. 
अल्हड़ हवा 
धरती का बदन 
छू-छू भागती |  
 

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