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वर्ष: 2, अंक 31, फरवरी(द्वितीय), 2018



कौन हो ?


अप्रीत ‘अदब’


 
ऐ मेरे गुमसुम से भाई कौन हो ?

रात संगम से चला था
कुछ समय अच्छा भला था
रात भर अंदर से शीतल
और बाहर से जला था
बर्फ के जैसे गला था
पर तभी सिसकी लपेटे
कान में आवाज़ आई कौन हो ?
ऐ मेरे गुमसुम से भाई कौन हो ?

केश का बांधे है जूड़ा
बोलता है एक बूढ़ा
बांये में चिमटा उठाये
दांये में पहने है चूड़ा
ट्रेन की खातिर है कूड़ा
कह रहा है खाँसकर की
क्यों मुझे बीड़ी पिलाई कौन हो ?
ऐ मेरे गुमसुम से भाई कौन हो ?

पर अभी भी मौन हूँ मैं
सोचता हूँ कौन हूँ मैं
रात का जागा शिफ़ाई
या ख़्याली जौन हूँ मैं
इस कदर क्यों मौन हूँ मैं
क्यों तुम्हारी सांवली की
कर रहे हो जगहसाई कौन हो ?
ऐ मेरे गुमसुम से भाई कौन हो ?

बात गुस्से में ठनी है
शर्ट काँधे तक तनी है
कुछ चुने लोगों का डिब्बा
हर किसी से अनबनी है
हर किसी से दुश्मनी है
क्यों हर इक चेहरे से चिढ़कर
कर रहे हो तुम लड़ाई कौन हो ?
ऐ मेरे गुमसुम से भाई कौन हो ?

थक गए हो वेट कर
खाना खिलाऊँ पेट भर
अच्छा सुनो बेटा उठो
आराम कर लो लेट कर
बैठे हुए हो गेट पर
पूछता हूँ फिक्र मेरी क्यों करी
तुम ने ओ माई कौन हो ?
क्यों मुझे बेटा बुलाई कौन हो ?

कामनाएं रोज़ भर की
यातनाएं उम्र भर की
और चेहरे पर तुम्हारे
दूसरे अंजान घर की
फिर रही है एक लड़की
किस महल के हो भुलाये
सरचढ़े रूठे जमाई कौन हो ?

ऐ मेरे गुमसुम से भाई कौन हो ?
 

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