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वर्ष: 2, अंक 31, फरवरी(द्वितीय), 2018



चाँदनी सी हो गयी हो


अप्रीत ‘अदब’


 	
 	
चाँदनी सी हो गयी हो रात तुम
और करना चाहती हो बात तुम

नींद आंखों से बराबर खो रही हो
झूठ यह एहसास देकर सो रही हो
मेघदूतों से विरह का हाल पाकर
यक्ष की उन्मत्त अलका हो रही हो
दूरियों से पा गयीं आघात तुम
और करना चाहती हो बात तुम

रात भर दोहराओगी झूठी कहानी
रात भर समझाओगी सच्ची कहानी
रोज़ की तरह ही लेकिन कल सुबह फिर
ख़त्म करना चाहोगी मीठी कहानी
दे रही हो आप ही को मात तुम
और करना चाहती हो बात तुम

जो तुम्हारी ख्वाहिशों का था सहारा
खो गया ख़ुद में तुम्हारा पा सहारा
मृत्यु के देकर बहाने जानती हो
पा रही हो और जीने का सहारा
और स्याही चाहती हो रात तुम
और करना चाहती हो बात तुम

है बहुत आसान रिश्ता तोड़ आना
राह में इक और रस्ता जोड़ आना
दूर तक तो साथ आने से रहीं तुम
द्वार तक ही आज मुझ को छोड़ आना
दे रही हो प्यार की सौगात तुम
और करना चाहती हो बात तुम
 

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