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वर्ष: 2, अंक 31, फरवरी(द्वितीय), 2018



ख़्वाब आँखों को नये रोज़ दिखाने होंगे


यूसुफ़ रईस


 
ख़्वाब आँखों को नये रोज़ दिखाने होंगे ।
दिल के क़िरतास पे कुछ नक़्श बनाने होंगे 

रात भर तुमको भी मुस्तैद खड़े रहना है 
इन चराग़ों पे हवाओं के निशाने होंगे ।

खुश्क आँखों के भी रस्ते में समंदर हैं कई
जिनमें बिखरे हुए अश्क़ों के ख़ज़ाने होंगे ।

वो तुझे भूल गया छोड़ पुरानी बातें 
उसकी यादों के तुझे नक़्श मिटाने होंगे ।

मुझको बस्ती में ज़रा और ठहर जाने दे 
फिर ख़ुदा जाने कहाँ मेरे ठिकाने होंगे ।

कब तलक ग़ैर से मांगेंगे उजाले हम तुम 
अपने सूरज भी हमें ख़ुद ही उगाने होंगे ।

अब भी इस मुल्क की तस्वीर बदल सकती है 
हमको गुज़रे  हुए कुछ दौर  भुलाने होंगे ।

 

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