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वर्ष: 2, अंक 31, फरवरी(द्वितीय), 2018



एक लम्हा गुजार कर आये


डा. दिनेश त्रिपाठी `शम्स’


 
एक लम्हा गुजार कर आये ,
या कि सदियों को पार कर आये |

जीत के सब थे दावेदार मगर ,
एक हम थे कि हारकर आये |

आईने सब खिलाफ़ थे लेकिन ,
पत्थरों से क़रार कर आये |

ज़िन्दगी एक तुझसे निभ जाये ,
खुद से धोखे हज़ार कर आये |

आज़ ही हम बज़ार में पहुंचे , 
आज ही हम उधार कर आये |

अपने दामन को खुद रफ़ू करके ,
खुद ही फिर तार-तार कर आये |

तेरी महफ़िल में ‘शम्स’ आये जो ,
ग़म की चादर उतार कर आये .
 

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