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वर्ष: 2, अंक 31, फरवरी(द्वितीय), 2018



ख़्वाहिश-ए-दिल हज़ार बार मरे


डा. दिनेश त्रिपाठी `शम्स’


 
ख़्वाहिश-ए-दिल हज़ार बार मरे , 
पर न इक बार भी किरदार मरे |

प्यार गुलशन करे है दोनो से ,
न तो गुल और न ही ख़ार मरे |

चल पड़े तो किसी की जान मरे ,
न चले तो छुरी की धार मरे |

ताप तन का उतर भी जाये मगर ,
कैसे मन पर चढ़ा  बुखार मरे |

ज़िन्दगी तू है अब तलक ज़िन्दा ,
मौत के दांव बेशुमार मरे |
 
 

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