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वर्ष: 2, अंक 31, फरवरी(द्वितीय), 2018



धूप को सर पर लिये चलता रहा


अनिरुद्ध सिन्हा


 
धूप को सर पर लिये  चलता रहा 
मैं ज़मीं के साथ  ही जलता रहा 

नफ़रतों के  जहर पीकर  दोस्तो
प्यार के साँचे में मैं  ढलता रहा 

टूटकर इक दिन बिखर जाऊँगा मैं 
मेरे अन्दर  खौफ़ ये  पलता रहा

लौट आया आसमां को  छूके  मैं 
जलनेवाला उम्र- भर जलता  रहा 

लोग अपनी मंज़िलों को  हो लिये  
वो  हमेशा  हाथ  ही मलता रहा 
 

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