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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 75, दिसम्बर(द्वितीय), 2019

दंगा या दाग

राजीव कुमार

दंगा गहरा गया था, दोनों शहर को क्षति हुई थी। एक जलकर खाक हुए वीरान शहर ने दुसरे शहर से पूछा ’’ दोस्त, हिन्दू और मुसलमान तो तुम्हारे अन्दर भी भरे पड़े हैं, फिर भी तुमको हल्की खरोंच और चोट आई और मेरा अस्तित्व ही खतरे में आ गया, ऐसा कैसे हुआ मेरे भाई? ’’

दूसरा शहर इस सवाल का कोई जवाब नहीं देना चाहता था, बुरी नजर से उसको अब भी खतरा था, फिर भी ’बताओ न’ शब्द बार-बार सुनकर उसकी जिद्द के सामने घुटने टेकते हुए उस शहर ने इधर-उधर, दांए-बांए और आगे-पीछे देखा और जवाब दिया ’’ देखो दोस्त , ये बात हमारे और तुम्हारे बीच में रहे, मेरे शहर में दंगा होने की आशंका को मेरे हिन्दू और मुसलमान ने भाई चारे से अपने आप में सुलझा लिया और तुम्हारे लोगों ने? ’’ उसने इशारे से समझाया और अब उस शहर के दिलो-दिमाग में उस और वैसे कई स्वार्थी नेताओं का चेहरा और इतिहास तैर गया, दूसरा शहर तुरंत वहां से निकल गया।


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