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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 75, दिसम्बर(द्वितीय), 2019

मजदूर

राजीव कुमार

लखिया अपने पुरे परिवार के साथ फुथपाथ पर रहता था, पति-पत्नी मजदूरी करते थे, इसलिए अभयस्त थे लेकिन अपने पाँच वर्षीय बेटे को जाड़ा, गर्मी और बरसात से बचाने के लिए पुरा इन्तजाम करता।

अपने माँ-पिता की बातों को सुनकर-समझकर पाँच वर्षीय लड़के ने कहा ’’ बापू तुम मजबूर हो, मजबूरी करते हो। ’’

लखिया ने बच्चे को गोद में लेकर कहा ’’ बेटा, मजबूर नहीं मजदूर।’’

एक दिन, एक अमीर लड़के को देखकर, लखिया का बेटा भी खिलौना दिलाने की जिद्द करने लगा तो लखिया ने पहले समझाया फिर एक तमाचा जड़ दिया। बच्चा जब बहुत देर रोते हुए शान्त हुआ तो लखिया ने अपने बच्चे से कहा ’’ मैं उतनी महँगी गाड़ी नहीं दिला सकता, मजबूर हूँ। ’’

बच्चे ने मासूमियत से कहा ’’ उस दिन तो तुम बोले मजदूर हूँ। ’’

लखिया ने अपने बच्चे को गोद में उठाया और सीने से चिपका कर कहा ’’ हाँ बेटा, मैं मजबूर भी हूँ और मजदूर भी हँू।’’ लखिया की आँखें नम हो आई थीं, लखिया और मेहनत और उसकी पत्नी और बचत करने लगी, अपने बच्चे की हर इच्छा पूरी करने के लिए।


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