मुखपृष्ठ
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 75, दिसम्बर(द्वितीय), 2019

रंग बिरंगे मोतियों की मालाएँ ( सच्ची घटना )

कविता गुप्ता

शीर्षक बहुत साधारण लेकिन इसमें छिपी भावना व् ध्येय ऊँचा। पिछले वर्ष भारत में केरला भ्रमण में कन्या कुमारी जाने का सौभाग्य मिला। सांय काल समुन्द्र के किनारे घूम रही थी अचानक मटमैले कपड़ों में लिपटी अधेड़ उम्र की औरत ने यह कह कर '' माँजी मोतियों की माला ले लो कई रंगों में है'' जो उसने बाजुओं में लटका रखी थी मेरा ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। मैंने भी सरसरी निगाह दौड़ाई कहा, ''नहीं चाहिए मुझे'' माँजी बहू, बेटी के लिए ले लो ? मैं निरुत्तर थी। कारण स्पष्ट समझ गए होंगे ? उसका टूटा दिल मेरे सामने था। खैर थोड़ा दिमाग से जब सोचा ''ले लो'' कारण कि यदि मालाएँ बेचेगी तो पेट भरेगी अन्यथा भूख तो मुहँ बाए खड़ी दिख ही रही है। संक्षिप्त में.... मैंने मोल भाव किया 40 रुपए की छः मालाएँ ? सौदा महँगा नहीं। विदेशी करंसी का तो एक डालर भी नहीं बनता। छः लेकर छः की और लालच क़र ली क्योंकि लगभग सभी अलग २ रंगों में थी। 80 रुपए जब उसके हाथ थमाए वह बाग़ २ हो गई। उसके सपनों और पाँवों को जैसे पंख लग गए हों। वह तुरंत घर जाकर पापी पेट की क्षुधा शांत करना चाहती थी। यह सब उसका चेहरा बता रहा था।

मैं उस 'बहुमूल्य खरीदारी' के साथ कैनेडा लौट आई। मुझे बेहद महँगी...shopping से यह सस्ती, सार्थक 'सौगात' कहीं अधिक बेहतर और दिलकश लगी। क्या बात जब रंग बिरंगे सूटों के साथ मेल खाती साधारण सी सिर्फ 7 रु की माला पहनती हूँ तो मेरा मन किसी कोने में दबी उसकी विवशता, निर्धनता, अपने निर्णय, सबसे बड़ा 'उसके' निर्देश को मानने की गवाही देता है। मैं कृतज्ञ हो जाती हूँ। इसके साथ अगर कोई हम उम्र यह कह दे ''कविता क्या कमाल हो'' गदगद हुई भाव विभोर हो जाती हूँ फिर कलम कहती है ''उलीक दे प्रेरणास्पद है। पाठकों से साँझा भी कर दे ताकि सुह्रद लोग तुम्हारी भावना समझ स्वागत करें ?


कृपया रचनाकार को मेल भेज कर अपने विचारों से अवगत करायें