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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 75, दिसम्बर(द्वितीय), 2019

कैंडल मार्च!

ज्योति मिश्रा

आज फिर शहर में कैंडल मार्च निकला है, शहर के हर छोर से | महिला, पुरुष, चाहे वो प्रौड़ हो या युवा, सभी तो हैं | कहीं गुस्सा, कहीं उदासी, कहीं आश्चर्य, चेहरे विविध भावों से भरे हैं |

पर क्यूँ?

" अरे बाप रे! इतनी भीड़, आज कुछ है क्या अपने शहर में? सब मोमबत्ती लेकर क्यूँ चल रहे सड़क पर?दिवाली है क्या? और उन अंकल ने तो किसी लड़की की फ़ोटो ले रखी है | कौन है वो माँ ? और ये सब क्या करेंगे फ़ोटो के साथ?"

" कबतक ऐसी घटना होगी?
शर्मसार ये दुनिया होगी,
क्रंदन का अभिशाप मिटेगा,
या चिता पर कलियाँ होंगी?"

ये लोग क्या नारे लगा रहे हैं? बताओ न माँ!

कुछ नहीं बेटा, बस एक घटना हुई है जैसी निर्भया दीदी के साथ हुई थी, वैसे ही | बस इस बार फिर नाम बदल गया है | कुछ दिन कैंडल मार्च करेंगे सब फिर धीरे - धीरे शांत हो जाएंगे |

किसने की उनके साथ घटना माँ?

पता नहीं बेटा, हो सकता है इस कैंडल मार्च में वो अपराधी हो या फिर इस बार का नहीं तो अगली बार होने वाले ऐसे हादसे का अपराधी जरूर कहीं किसी शहर में कैंडल मार्च कर रहा होगा |

माँ! मुझे डर लग रहा, कभी मेरे साथ ऐसा तो नहीं होगा न?

एक पल के लिए साँस थम सी गई, और नजरें बस उस मासूम से चेहरे पर ठहर सी गईं |

माँ! माँ!... माँ!...प्यारी सी आवाज से चौंक पड़ी वो, होश में आते ही उसे सीने से लगाते हुए रो पड़ी.... मेरी गुड़िया... मेरी प्यारी गुड़िया... तुझे कहीं नहीं जाने दूँगी... कभी.. कभी अपनी नजरों से दूर नहीं करूंगी... मेरी गुड़िया... मेरी रानी .....!!

माया! माया! क्या हुआ? क्यूँ चीख रही हो? क्या हो गया?

पति की आवाज से वो चेतन दुनिया में वापिस आई, वो... वो... वो मेरी गुड़िया.... अपने गर्भ में पल रही उस नन्ही सी जान पर अपनी ममता का स्पर्श करते हुए वो रो पड़ी |

पति के प्रेम पूर्ण आलिंगन ने उसे इस पल के दर्द से उबरने का साहस तो दे दिया था, परंतु अब भी उसके मष्तिष्क में अपनी सपनों की गुड़िया को सोंच कर बस एक ही तूफान चल रहा था |

"क्या बताऊँ गुड़िया तुझको?
क्या सताए मेरे मन को,
आमर्ष शिखा को हवा मैं दूँ,
या हाथ थमा दूँ विष मैं तुझको |"


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