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वर्ष: 1, अंक 6, दिसम्बर, 2016



पुस्तक समीक्षा


डॉ०रजनीकांत शाह


गंगवारपुर का गदर :देशभक्ति की उत्कृष्ट गाथा
अध्येता :डॉ.रजनीकान्त एस.शाह
उपन्यास का नाम : गंगवारपुर का गदर
(1857 की देशभक्ति पूर्ण एक ग्राम्य कथा )
लेखक : डॉ.राकेशकुमार सिंह
ISBN:978-93-82197-72-0.
प्रकाशक : सुकीर्ति प्रकाशन, करनाल रोड़, कैथल. पिनकोड : 136027. हरियाणा.

देशभक्ति की उत्कृष्ट भावना से निथरते उपन्यास ‘गंगवारपुर का गदर’(1857 की देशभक्ति पूर्ण एक ग्राम्य कथा) पढ़ने का अवसर मुश्किल से मिलता है। इस उपन्यास को लेखक ने उन लोगों को समर्पित किया है जो अत्याचार और भ्रष्टाचार के विरोध में उठ खड़े होते हैं। यह समर्पण भाव लेखक की जागृत सामाजिक और राष्ट्रीय चेतना का बोध कराता है। इस उपन्यास के सुयोग्य साधक लेखक डॉ. राकेशकुमार सिंह ने मानों इस उपन्यास के चयन के द्वारा अपने देशभक्ति के जजबे का परिचय दे दिया है। इस रचना में ऐतिहासिक परिवेश का होना स्वाभाविक ही है क्योंकि इसमें 1857 के स्वतन्त्रता संग्राम के वातावरण को लेखक ने बखूबी उजागर किया है। लेखक ने गंगवारपुर में पली-पनपी कथा को उजागर करके उपेक्षित सी रही ऐसी कईं गाथाओं को आजादी प्राप्ति के बाद जन्मी नयी पीढ़ी के समक्ष उद्घाटित किया है। एक तरह से आजादी के मूल्य से बेखबर और राष्ट्रप्रेम से लगभग बेखबर नई पीढ़ी को एक संदेश पहुंचाया है कि इस अनमोल आजादी की बुनियाद को अनेक देशभक्तों के शोणित ने सींचा है, पुख्ता किया है। इन वीर बांकुरों की आत्माहुति का स्मरण करते हुए इस महान देश के गौरव को आनेवाले समय में भी बरकरार रखना है। इस उपन्यासकार ने उपन्यास के प्रारम्भ में ‘कुछ अलग से‘ में मानो इस रचना की जन्मपत्री ही रख दी है। साधारण सी दिखनेवाली फिरभी संवेदनशील हृदय की व्यथा को लेखक ने नपे तुले ढंग से पाठकों के समक्ष रखा है। साहित्य में कुछ खास पात्रों के प्रभाववश अन्य तेजस्वी पात्र उपेक्षित रह गए हैं, ऐसी वेदना कवि कुलगुरु रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने व्यक्त की है और हिन्दी साहित्य में रश्मीरथी के माध्यम से कर्ण, साकेत के माध्यम से उर्मिला और कैकेई,यशोधरा के माध्यम से यशोधरा जैसे चरित्रों की उदात्तता को इन रचनाओं के स्वर्गीय रामधारीसिंह दिनकर तथा मैथिलीशरण गुप्त आदि समर्थ कवियों ने प्रकाशित किया है। इसी प्रकार उपन्यासकार डॉ.सिंहजी ने इस स्वतन्त्रता संग्राम की स्वातंत्र्य चेतना की उदात्त लहर से अनुप्राणित होकर इस राष्ट्रीय महायज्ञ में अपने योगदान द्वारा राष्ट्रीय कर्तव्य अदा करनेवाले देहातों को भी अमर ही नहीं किया पर गौरवान्वित भी कर दिया है।

मिश्र प्रकारी कथानक से सज्जित इस उपन्यास के महदांश पात्र काल्पनिक हैं लेकिन यह कहना अनुचित न होगा कि ये चरित्र में गाँव की मिट्टी से पगे हैं और उनमें राष्ट्र-प्रेम कूट कूट कर भरा है तथा उनकी सनातन जीवनमूल्यों के प्रति गहरी आस्था है तथा देशप्रेम से युक्त हैं। पुरुष पात्रों में शक्तिसिंह, यदुनंदनसिंह, भास्करराव सावंत, नरसी भगत,बबुआ पहलवान, पंडित देऊतादीन, मन्नीसिंह, पीरअली, कुंअरसिंह, जोधाबाबा,मंगला, चंदा,छल्लो-बैरागीन आदि काल्पनिक पात्र हैं तो तात्याटोपे,बहादुरशाह जफर,वाजिदअली शाह,बेगम हजरतमहल,झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई आदि इतिहास समर्थित पात्र हैं। कुछ पात्र ऐसे भी हैं जो अपने स्वार्थवश फिरंगियों से जा मिलकर देश की कुसेवा करते हैं। जेक्सन जैसे पात्र धर्म परिवर्तन कर देते हैं, फिरंगियों के मुखबीर बनते हैं तो आखिर में हृदयपरिवर्तन भी अनुभव करते हैं और अपनी देश से गद्दारी की भूल को सुधार कर देश और समाज की मुख्य धारा से जुड़ जाते हैं।

राष्ट्रीय एकता, स्वतंत्रता,भाईचारा आदि सनातन जीवनमूल्यों को प्रतिष्ठित करने के लिए प्रतिबद्ध उपन्यासकार ने इस उपन्यास के माध्यम से हमारे महान राष्ट्र की विकास गति को अवरुद्ध करनेवाली अहितकारी ताकतों को पराश्त करने तथा सनातन मूल्यों की प्रतिष्ठा के लिए संदेश देते हैं-‘उठो देशवासियों उठो। धर्म, जाति, प्रांत की दीवारें गिरा दो। देश के दुश्मनों को पहचानो। वह हमारे बीच में हो सकते हैं और तुम्हारे बीच में भी। देश के हितैषियों एक हो जाओ। करो, कुछ करो। देश के लिए कुछ करो।‘

लेखक ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि गंगवारपुर की यह ग्राम्यकथा किसी खास गाँव,किसी एक समुदाय या व्यक्तिविशेष की गाथा न रहकर एक ऐतिहासिक सत्य की प्रतिष्ठा करे और एक स्वस्थ संदेश प्रदान करे यही लक्ष्य इस उपन्यास की संरचना के मूल में है।

लेखक ने एक कुतूहल भी इस उपन्यास के अंत में रखा है कि तात्या टोपे को फांसी का दंड तो फिरंगियों ने दिया पर फांसी के तख्ते पर बिना आँख पर पट्टी बाँधे,खुशी खुशी जो चढ़ गया वह कौन था? और

जो सन्यासी के रूप में गंगवारपुर में आकर रहा वह क्या तात्या टोपे तो नहीं? तात्पर्य यही है कि देश के लिए बलिदान देने के पीछे भास्करराव सावंत का उद्देश्य यही रहा कि अभी तात्या टोपे के नेतृत्व की देश को अभी आवश्यकता है। अत:उनका जीवित रहना अति आवश्यक है।

कुल मिलाकर यह उपन्यास ऐतिहासिक परिवेश से युक्त होने पर भी आज की और आनेवाले समय की बात करता है और उन सनातन मूल्यों को प्रतिष्ठित करता है जो राष्ट्र की स्वतन्त्रता,विकास और उसकी प्रतिष्ठा को सुरक्षीत रखने के लिए अनिवार्य है। हमारा देश जिन परिस्थितियों से गुजर रहा है,विखंडनवादी ताकतों के हाथ में जा रहा है ,उनसे उसे महफूज रखना हम सब देशवासियों का परम कर्तव्य है। यह संदेश ही इस उपन्यास की प्रासंगिकता को प्रमाणित करता है।

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