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वर्ष: 1, अंक 6, दिसम्बर, 2016



वो पागल


शबनम शर्मा


गली-गली में घूमती रहती, फिर कभी मन्दिर के सामने या फिर सड़क के किनारे बैठ जाती। उसके बच्चे उसी शहर में रहते थे। उसे ढूंढकर कहीं भी वो उसे खाना देकर आते, उसके कपड़े बदलवा कर आते। फिर भी पूरा दिन घर से बाहर रहकर वो बीमार हो गई। उसे बहुत ज़ोर का बुखार था। उनकी बड़ी बेटी उन्हें अस्पताल लेकर गई, उनका चैकअप कराया। डा. ने उन्हें टी.बी. बताई। जैसे-तैसे उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया। उनके स्टाफ को उनकी हालत के बारे में बताया गया। उनके ऊपर निगरानी भी रहने लगी। दवा भी उन पर असर न कर रही थी, वह दिन-प्रतिदिन कमज़ोर हो रही थी। एक दिन नर्स ने उन्हें विश्वास में लेकर पूछा, ‘‘आप क्या सोचती रहती हैं?’’ उन्होंने जवाब दिया, ‘‘मैं जानती हूँ सब मुझे पागल कहते हैं पर मैं पागल नहीं हूँ। जब ठाकुर दूसरी ठकुराइन ले आया था तो मैंने उसे घर से नहीं निकाला, खुद घर छोड़कर आ गई और कभी नहीं जाऊँगी। और हाँ, बेटा मेरी मृत्यु के बाद मुझे उस घर में ही भेजना क्योंकि मैं ब्याह कर वहाँ आई थी और जाऊँगी भी वहाँ से।’’कहते-कहते उसने आँखें बंद कर ली, जो कभी न खुली। नर्स एकटक उस पागल की नब्ज़ संभाले काँप रही थी।
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