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वर्ष: 1, अंक 6, दिसम्बर, 2016



वो 1 नं. ईमानदारी


शबनम शर्मा


(पेपर) परीक्षा चल रही थी। बच्चों ने अपनी यथाशक्ति के अनुसार मेहनत की थी। कुछ बच्चे प्रश्नपत्र को देखकर परेशान नज़र आ रहे थे व दूसरे बच्चे खुश थे। कुछ सिर्फ थोड़े से नम्बरों के लिये परेशान थे तो कुछ सिर्फ मात्र पास होने का जुगाड़ जोड़ रहे थे। पर संजीव को सिर्फ उन 2 नम्बरों की फिक्र थी जो उसे आता न था। उसके मुकाबले का दोस्त हरीश भी बगल में बैठा था। दोनों ने पेपर करना शुरु किया। संजीव ने हरीश का उत्तर देखकर अपना ठीक करके लिख लिया। वह निश्चिंत हो गया और सारा पेपर सही होता देखकर उसकी खुशी का ठिकाना न रहा। परीक्षा खत्म होते ही कक्षा में पर्चे बंटे। संजीव के पूरे नम्बर थे और हरीश का मुँह उतर गया। संजीव को अपने किये पर बहुत ग्लानि हुई। वो उठा व अध्यापक के पास गया, उसने उन दोनों प्रश्नों के उत्तर पर उंगली रखी और कहा, ‘‘सर, ये 2 नम्बर मेरे नहीं हैं। मैंने किसी से पूछकर किये थे, मुझे माफ़ कर दो और ये 2 नम्बर कम करो। अध्यापक ने उसके कहने पर 2 नम्बर कम कर दिये। अब हरीश कक्षा में प्रथम था। संजीव को अति प्रसन्नता हुई क्योंकि वो इसके लिये खुद को कभी माफ़ न कर पाता।’’
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