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वर्ष: 1, अंक 6, दिसम्बर, 2016



धनाक्षरी 3

सुशील यादव


आदमी बदला किए, था हालात की सूरत वो आइना बदल के, लो तसल्ली में है तेरी याद के जुगनूँ ,रात चमकते रहे अपनी तन्हाई भी ,यूँ कहो बिजली में है लहुलुहान वैसे भी, यहाँ फूलो का मौसम शजर झुलसने का ,गम तितली में है अब भी किया करती ,हो मुझे याद बारहा कभी तू सांस खिचती ,कभी हिचकी में है दबे पाँव जाना इस , जीवन से कहीं दूर मजा ! मन्नत, दुआ , न दिल्लगी में है
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