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वर्ष: 1, अंक 6, दिसम्बर, 2016



धनाक्षरी 2

सुशील यादव


घुलने लगा जहर ,बेहाल जिंदगी में गिनता हूँ जुगनू भी ,मै रात- चांदनी में तुम गए नहीं देखो , मुह फेरता समय बदहाल जी रहे हैं ,भटके बेबसी में हमने लिखा रेत में ,खत तुम्हारे नाम संदेश मिलता होगा , सुखी हुई नदी में किसके वास्ते लौटा,बीता हुआ हर पल हो लम्हों की खताए,सजा मिले सदी में सजाना चाहो अगर, हमें जुड़े में टांकना बागो में खिले रहते, हैं फूल सादगी में
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