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वर्ष: 1, अंक 6, दिसम्बर, 2016



धनाक्षरी

सुशील यादव


पर जिनके कटे थे ,वो परिंदे कहाँ गए हाँ ,सीधे सादे गाँव के, बाशिंदे कहाँ गए जमीन खा गई उसे ,कि निगला आसमान निगरानी शुदा थे वो , दरिन्दे कहाँ गए हाँ यही है वो जगह,कल्पना का लोक था सब चीजें मिल रही ,घरौंदे कहाँ गये मजहब की जमीनो में ,ये बारूद और धुँआ ढेर लगी लाशो फिर,जिन्दे कहाँ गये तेरे होने का सुकून ,रहता कहीं भीतर सर रखे जहाँ रोते ,वो कंधे कहाँ गए
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