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वर्ष: 1, अंक 6, दिसम्बर, 2016



भीड मे

सुशील यादव


भीड़ में कोई किसी को, रास्ता नहीं देता एक तिनका डूबे को , आसरा नहीं देता कहाँ ले जाओगे तुम ,अपनी उखड़ी साँसे बीमार को जी भर ,कोई हवा नहीं देता मै चाहता, उतार दूँ ,ये गुनाह के नकाब खुदा मुझे मुनासिब ,चेहरा नहीं देता मिले शायद इनसे, पल दो पल की खुशी जीवन की मुस्कान .मसखरा नहीं देता कितने चारागर से, मिल पूछा किये हम मर्जे इश्क, दाग क्या ?, गहरा नहीं देता कल की कुछ धुधली ,बनी रहती तस्वीरे आज का अक्स साफ ,आइना नहीं देता उनसे मिल के जुदा, हुए बरसों बीते हैं मेरा 'सुकून' ठिकाना, या पता नहीं देता
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