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वर्ष: 1, अंक 6, दिसम्बर, 2016



मत सोच कुछ नहीं होगा इस दुनिया में…

डॉ. श्रीलता सुरेश


दुनिया दहक रहीं है आग में, अब कुंभकर्ण की निद्रा से जाग छोड़ घिसा –पिटा अपना यह राग कुछ नहीं होगा इस दुनिया मे| लोग कुछ करें या न करें तू क्यों उनसे अब डरे तेरे भाई या संबंधी हैं मरे मत सोच कुछ नहीं होगा इस दुनिया में| मत सोच क्या पाया इस दुनिया में तूने क्या दिया इस संसार में कई कार्य बचे हैं तुझे करने को मत सोच कुछ नहीं होगा इस दुनिया में| जीना है, जी भरकर जी ले, इंतज़ार न कर मौत के शोले, कुछ कर दिखा फिर कुछ भी होले, मत सोच कुछ नहीं होगा इस दुनिया में|
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