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वर्ष: 1, अंक 6, दिसम्बर, 2016



चले जा रहे हैं चले जा रहे हैं

सुधेश


चले जा रहे हैं चले जा रहे हैं नहीं पर पता है किधर जा रहे हैं। किसी ने कहा है तरक़्क़ी यही है तरक़्क़ी के मारे छले जा रहे हैं । हमीं बुद्धिजीवी हमीं शकित शाली ट जिन्हें गर्व इतना वे पछता रहे हैं । दिलों में है नफ़रत मुहब्बत ज़बां पर यही इक तराना सभी गा रहे हैं ।
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