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वर्ष: 1, अंक 6, दिसम्बर, 2016



आज फिर उस पगली की याद आई है!

सुनील कुमार लोहमरोड़ ‘सोनू’


जैसे उमड़े हों बादल सावन आने से पहले, जैसे खिली हों कलियाँ भँवरे के गाने से पहले, अपनी ही मस्ती में जैसे कोयल गाने लगी हो, हरियाली भी चुपके चुपके जैसे हर्षाने लगी हो, एक अनजानी सी उमंग दिल में छाई है। आज फिर उस पगली की याद आई है।। वो जैसे खुशी से तितली बनकर मचल रही हो, वो जैसे हिरनी बनकर इधर उधर उछल रही हो, वो जैसे खुशबु बनकर आज बिखरने लगी हो, वो जैसे आज एक मोर बनकर नाचने लगी हो, वो पगली आज मेरे अक्स में नजर आई है। आज फिर उस पगली की याद आई है।। लगा के जैसे मुझे बाँहों में भरने को हो आतुर, दुःख सुख की अपने बतियाने को हो व्याकुल, किरण जैसी चंचल जैसे हो उतरी धरा पे, अम्बर में चमकिला तारा जैसे निकला हो शरमा के, चलते चलते आज तो कलम भी बल खाई है। आज फिर उस पगली की याद आई है।।
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