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वर्ष: 1, अंक 6, दिसम्बर, 2016



मुट्ठी भर आकाश

शोभा श्रीवास्तव


1. होगा जरूर मेरा अपना दायरा फैले हुए पंख जितनी जगह मुट्ठी भर आकाश उडूंगी मैं भी जमीन को थामे बाहें फैलाये एक दिन ढालूंगी खूबसूरत आकार में ये पहाड़ सा जीवन। 2. देहाड़ी कर साँझ ढले घर लौटती थकी - माँदी लड़की सुनो आकाश तुम्हारी मुट्ठी में है दबा-दबा है टुकड़ा भर चाँद खोलो मुट्ठी करो आजाद अपने हिस्से की रोशनी आसान हो जाएगा अँधेरे का सफर।
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