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वर्ष: 1, अंक 6, दिसम्बर, 2016



सामना

शबनम शर्मा


आज बरसों बाद उनसे सामना हो ही गया। पहचानने में तनिक देर न लगी वही प्यासी आँखें, थरथराते लब जो कभी कुछ भी बयान न कर पाये। ले गये घसीट कर मुझे अतीत के उस आँगन में जहाँ पहली बार शादी के जमघट में आँखें चार हुई थी उनसे। वो चुपचाप लम्बे-लम्बे खत देना व लिखना, खुद ही बतियाना और हँसना सामने आने पर मूक हो जाना, अचानक रूला गया मुझे। बरस बीत गये वक्त का पहिया न रुका, सुना जिद्द की उसने मुझ संग ब्याह रचाने की, हार गया गोटी माँ-बाप, रिश्तेदारों की कसमों के सामने। वो ब्राह्मण लड़की से ब्याह नहीं कर सकता ब्याह हो गया उसका, पर आज भी हमारी वही आस, वही प्यास, वही स्पर्श झुंझलाता है हमें, कि काश खड़ा हो जाता दोनों के दरमियाँ।
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