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वर्ष: 1, अंक 6, दिसम्बर, 2016



आस

शबनम शर्मा


ज़िन्दगी की आस में तुम्हारा पास होना कितना रोमांचित करता मुझे। रंगीन हिलोरे खाता मेरा मन इंद्रधनुषी आसमान की तरह, पहचान लेते लोग मेरा ये बरसाती मौसम। कितना कटु व भयानक यथार्थ दिया तुमने, सदैव नमक ही छिड़का मेरे दहकते जख्मों पर। रिसते सदैव रूलाया मेरी हँसती आँखों को, सिसके हैं मेरे अरमान झोली पसारकर। पर तुम न पिघले। खड़ी है मेरी ज़िन्दगी आखिरी कगार पर यही सोचती कि आस किसी यथार्थ से कितनी भली।
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