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वर्ष: 1, अंक 6, दिसम्बर, 2016



आँगन

शबनम शर्मा


ब्याह होते ही क्यूँ पराया हो गया आँगन। ताकती नहीं वो तुलसी भी मुझे बुलाता नहीं दादा का हुक्का भी, दादी भी अपनी संदूकड़ी भैया के बच्चों को बाँटती, पड़ोसी भी पूछते ‘रानी आई है’ पीहर, कब तक रहेगी? बात-बात में भईया-भाभी भी हँसकर पूछ लेते मेरा ‘प्रोग्राम’ चाची हाल पूछती व बोल ही देती ‘जमाई’ कब आ रहे तुम्हें लिवाने? पिता नहीं दिखाते वो चिड़िया का सामने वाले पेड़ पर घोंसला न ही गाते वह गीत। सिर्फ माँ दिखती बटोरते छोटा-छोटा सामान। क्यूँकि उसे भी इन्तज़ार है चिड़िया के उड़ जाने का फिर भी, चुन्नी के आँचल से आँखें पोंछती कई बार रो देती और कहती, ‘‘बेटी वो घर ही अब तेरा घर है।’’ सोचती बेटी, शायद इन सबका निर्णय उसे भेजना है उसके घर जहाँ अब आँगन, पिता, माँ, भाई-बहनों को अपना बनाने में उमर गुज़र जायेगी और ग़र रोयेगा तो सिर्फ उस और इस घर का आँगन जब वो इन्हें छोड़कर जायेगी।
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