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वर्ष: 1, अंक 6, दिसम्बर, 2016



तुम ही तो हो

राम लखारा विपुल


भंवरों के दिल से निकले जों फूलों का पैगाम लिखूं खिलती ठंडी भोर कहूं या सुरमई कोई शाम लिखू। पर्वत के सीने से चलकर सागर गोदी जाने वाली कलकल करके बह रही जल धारा कोई नाम लिखूं। सावन की पहली बूंदों सा पावन वह एहसास कहूं गरमी में शीतल कर जाए प्यारी सी एक प्यास कहूं चिरसमय से विकल भू की बारिश के भीने मौसम में हल्के से मचलानी वाली सौंधी कोई सांस कहू। पहली फूटी कोपल की मनभावन अरूणाई हो बासंती फूलों पर खिलती अल्हड़ सी तरूणाई हो सब कष्टों को हरने वाली सच्चें मन की धारिणी मुझ किंचित को तरने वाली त्रिपथगा करूणाई हो। हिम पिघलें स्पर्श पाकर उस सूरज की गरमी हो। ओस कणों का अवलंबन हरी दूब सी नरमी हो। काश्मीर के आंगन में खिलती केसर क्यारी हो जग में होकर इस जग में सबसे पर तुम न्यारी हो। आंचल तन से लिपटा जैसे नभ में कहकश़ा कोई चंचल कोमल तितली सी मधु मादक नशा कोई पतझड़ में मुस्काने वाला बारहमासा फूल हो तुम मुझ लहरों का अंकन करता सागर का इक कूल हो तुम।
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