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वर्ष: 1, अंक 6, दिसम्बर, 2016



मंथन

प्रताप सिंह


बिलोड़ लेने दो समय को हमारा जीवन-घट; अलग हो जाने दो एक एक अवयव। भँवर की तरंगों पर झूलता हुआ जो श्रृंग तक पहुँचेगा, मंथन रुकने पर वही हमारे द्रव्य की पहचान बनेगा।
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