Sahityasudha view
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
मुखपृष्ठ


साहित्यकारों की रचना स्थली

वर्ष: 1, अंक 6, दिसम्बर, 2016



मेरा गाँव

महेंद्र देवांगन 'माटी'


शहरों की अब हवा लग गई कहां खो गया मेरा गाँव । दौड़ धूप की जिंदगी हो गई चैन कहां अब मेरा गाँव । पढ़ लिखकर होशियार हो गये निरक्षर नहीं है मेरा गाँव । गली गली में नेता हो गए पार्टी बन गया है मेरा गाँव । भूल रहे सब रिश्ते नाते संस्कार खो रहे मेरा गाँव । अपने काम से काम लगे है मतलबी हो गया है मेरा गाँव । हल बैल अब छूट गया है ट्रेक्टर आ गया है मेरा गाँव । जहाँ जहाँ तक नजरें जाती मशीन बन गया है मेरा गाँव । नहीं लगती चौपाल यहां अब कट गया है पीपल मेरा गाँव । बूढ़े बरगद ठूंठ पड़ा है कहानी बन गया है मेरा गाँव । बिक रहा है खेती हर रोज महल बन गया है मेरा गाँव । झोपड़ी कही दिखाई न देगा शहर बन गया है मेरा गाँव ।
www.000webhost.com

कृपया अपनी प्रतिक्रिया sahityasudha2016@gmail.com पर भेजें