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वर्ष: 1, अंक 6, दिसम्बर, 2016



यहीं पे भरना है

डॉ० अनिल चड्डा


दर्द मिले जिस रिश्ते में, उस रिश्ते का क्या करना है, मिले ख़ुशी बस उसको ही, जिसे राह पे अपनी चलना है । भगवान नहीं, इन्सान हैं हम, सब वक्त-वक्त की बातें हैं, कोई पाप भी करके फलता है, कोई पुण्य करे तो गलना है । हर युग यही होता आया, कोई पाता, कोई खोता आया, जब घड़ा पाप का भर जाता, सब यहीं भुगत कर मरना है । हर सुबह जब सूरज आता है, आशा की किरण ले आता है, नई राह, नई फिर सोच मिले, कुछ करने से क्यों डरना है । कुछ बातें जग में ऐसी हैं, जो कभी समझ नहीं आती हैं, सब यहीं पड़ा रह जाना है, सब यहीं पे हमने भरना है ।
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