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वर्ष: 1, अंक 6, दिसम्बर, 2016



आदत

डॉ० अनिल चड्डा


आदत सी बन गये हैं गिले-शिकवे, कभी तो हमारी भी कोई सुन ले । वो हमेशा चाहते रहे दूसरों का बुरा, उनकी दुआ फिर होगी कबूल कैसे । शमा को जलना है सब की खातिर, कौन ये बात पतंगे को समझाये । जवां होती उम्मीदें क्यों परवान चढ़ेंगी, मुश्किल राहों पर हमसे चला न जाये ।
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