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वर्ष: 1, अंक 6, दिसम्बर, 2016



तुम जो थे वो नहीं हो

अमरेन्द्र सुमन


हजारों -लाखों खोपड़ियों के मगज में जीवित मुर्दे पत्थर के सुडौल देह वाले अल्बर्ट एक्का आखिर पथरा ही गई न तुम्हारी चंचल आॅंखें जो देख नहीं पा रहीं वर्षों से खड़े तेरे ही पैरों की परिधि के इर्द-गिर्द कलियुग के उर्वर दिमाग वाले दुस्षासन द्वारा कई-कई द्रौपदी का चीरहरण अभिव्यक्ति के गूंगे मुॅह को ढाॅपकर बीते समय की अनुपलब्ध उपलब्धी से किस -किस को दिला पाओगे आभाष अपने निरर्थक उद्देष्यों की लम्बी उपस्थिति का शायद आजीज मौसम के घुमड़ते मेघ सी चिपचिपी योजनाएॅ तेरे रक्त के उबलते क्र्रोध पर अपनी मर्जी का तरल लेप चढ़ा गई हो या फिर ढल गए खोटे व्यवस्था के सम्मोहन के साॅंचे में अनिष्चित भविष्य के अस्वभाविक वर्तमान की कल्पना लिये तुम्हारी श्रवण शक्ति की आखिरी सीमा के काफी करीब खनकती चुड़ियों के एक-एक कर चटखने की आवाजें क्या कंपा नहीं जाती तेरे जिस्म के एक-एक खोखले अंगों को जो वर्दाष्त की सीमा से बाहर भी तुम हो बर्दाष्त कर रहे कभी तुमने महसूसा गौर से अपनी धरती के लिये पैदा हुए और तुम्हारी धरती किराये के संगीनों के सहारे जी रही बीच सड़क पर लावारिस केले के छिलके की तरह कारनामें फफूॅदी ओढ़े बस देखती ही जा रही रोज जन्म लेती खुषियों की कुचलती तस्वीरें उन तस्वीरों के पसीने से सींचती छोटी-बड़ी सैकड़ों,सहस्त्रों अन्य............... उधिया रहे किस्से के किसी हिस्से में दुश्मन के दाॅंत खट्टे करने तुमने पहने थे बारुद के मोटे लिबास बिस्मिल की इन पंक्तियों के साथ सरफरोषी की तमन्ना..................... बुरे इरादों के दुर्ग भेदकर तुम्हारी बहादुरी के तमगे अजेय नहीं हुए तुम्हें लड़ना होगा ,घर के उन शैतानों से जो एसिड बन तुम्हारी सभ्यता के चेहरे की परिभाषा को बदल देना चाहते हैं तुम्हें लड़ना होगा जब तक तुम्हारा नाम जीवित है पृथ्वी पर।
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