Sahityasudha view
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
मुखपृष्ठ


साहित्यकारों की रचना स्थली

वर्ष: 1, अंक 6, दिसम्बर, 2016



जिन रास्तों पे बिछे हैं कांटे

अमिताभ विक्रम


जिन रास्तों पै बिछे हैं कांटे, उन्हें अब बदल रहा हूँ मैं। मेरे कफ़न का कपड़ा है ज़रा महंगा, ज़िन्दगी तंगी में जी रहा हूँ मैं। ना काफ़िर रहा ना जिहादी बन सका, अब इंसान बन रहा हूँ मैं। तू पोथी में लिखा ढाई अक्षर है कोई जिसे अब पढ़ रहा हूँ मैं। तू मुझसे कभी कोई उम्मीद ना रखना, अब तेरा कहाँ रहा हूँ मैं। खाज सी ज़िन्दगी बढ़ती ही गयी, जब गयी तभी से सो रहा हूँ मैं।
www.000webhost.com

कृपया अपनी प्रतिक्रिया sahityasudha2016@gmail.com पर भेजें