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वर्ष: 1, अंक 6, दिसम्बर, 2016



अनकही कहानी... अनकहा दर्द ...!!


तारकेश कुमार ओझा


जीवन के शुरूआती कुछ व र्षों में ही मैं नियति के आगे नतमस्तक हो चुका था। मेरी समझ में यह बात अच्छी तरह से आ गई थी कि मेरी जिंदगी की राह बेहद उबड़ - खाबड़ और पथरीली है। प्रतिकूल परिस्थितियों की जरा सी फिसलन मुझे इसे पर गिरा कर लहुलूहान कर सकती है। उम्र् बढ़ने के साथ विरोधाभासी चरित्र के लोगों से हुआ सामना जीवन के प्रति मेरे विषाद को बढ़ाता चला गया। कल तक जो दानवीर कर्ण बने घूम रहे थे, आज उन्हें आर्थिक परेशानियों का रोना रोते देखा। दो दिन पहले जो पाइ - पाइ के मोहताज थे आज वे गाइड बुक लेकर बैठे दिखे कि इस बार त्योहार में सैर - सपाटे के लिए कहां जाना ठीक रहेगा। विरोधाभासी परिस्थितियां यही नहीं रुकी। बचपन से सुनता आ रहा हूं कि औरत की उम्र और मर्द की कमाई नहीं पूछी जानी चाहिए। मैने कभी पूछी भी नहीं। लेकिन पता नहीं कैसे अचानक अपनी या किसी की कमाई का ढिंढोरा पीटने की नई - आधुनिक परंपरा चल निकली। खास तौर से समाचार चैनलों पर अक्सर इसकी चर्चा देख - सुन कर हैरत में पड़ जाता हूं।मुझे लगता है कि चर्चा करने वाले तो अच्छे - खासे सुटेड - बुटेड हैं। निश्चय ही वे पढ़े - लिखे भी होंगे। लेकिन अपनी या किसी की कमाई का ढिंढोरा आखिर क्यों पीट रहे हैं। क्या उन्हें भारतीय संस्कृति की जरा भी परवाह नहीं। या फिर उन्हें इसकी शिक्षा ही नहीं मिली। बतकही से ऊब जाने पर मैं सोच में पड़ जाता हूं कि जो लोग चैनलों पर किसी फिल्म की कमाई की चर्चा कर रहे हैं वे जरूर महिलाओं से उनकी उम्र् भी पूछते होंगे। मैं दुनियावी चिंता में दुबला हुआ जा रहा हूं। जिंदगी की पिच पर मैं खुद को उस असहाय बल्लेबाज की तरह पा रहा हूं जिसके सामने एक के बाद आने वाले त्योहार खतरनाक बाउंसर फेंकने वाले तेज गेंदबाज की तरह प्रतीत हो रहे हैं। लेकिन टेलीविजन पर आज भी कई बार ब्रेकिंग न्यूज ... ब्रेकिंग न्यूज की चमकदार पट्टी के बाद खबर चल रही थी फलां फिल्म ने पहले ही दिन 21 करोड़ रुपए कमाए। बार - बार करोड़ - करोड़ का शोर मुझ पर कोड़े की तरह गिर रहा था। फिर शुरू हो गया कमाई का विश्लेषण। विश्लेषक बता रहे थे कि इस नई फिल्म ने तो खानों को भी पछाड़ दिया। यदि पहले ही दिन 21 करोड़ का कलेक्शन है तो यह आंकड़ा तो इतने करोड़ में जाकर रुकेगा। कमाई रिकार्ड तोड़ होगी।

इस लिहाज से देखें तो फलां बंदा खान तिकड़ी को पछाड़ चुका है। मैं बेचैन होकर चैनल बदलता जा रहां हूं। मेरी निगाहें अपने जैसे आम आदमी से जुड़ी खबरें तलाश रही है। लेकिन अमूमन हर जगह अनकही कहानी की ही चर्चा। क्या सड़क - क्या गली हर तरफ वहीं अनकही कहानी। सिर पर हेलमेट और कंधे पर भारी बल्ला। मैं सोच रहा हूं कि विशाल पूंजी वाला बाजार क्या यह सब इसलिए कर या करा रहा है जिससे वह गरीब वर्ग भी जो क्रिकेट देखता जरूर है , लेकिन क्रिकेट खिलाड़ी बनने का सपना उसके लिए दिवास्वपन के समान है। वह भी खिलाड़ी बनने का सपना देखना शुरू कर दे। वह भी उसी कंपनी का जूता पहने जो उसका पसंदीदा खिलाड़ी पहनता है। उसी कंपनी का ठंडा पेय पीए जो उसका फेवरिट खिलाड़ी पीता है। शंकालु मन चुगली करता है कि कहीं करोड़ों का यह खेल इसी वजह से तो नहीं खेला जा रहा है। क्योंकि त्योहारी माहौल में हर दूसरे चेहरे पर मुझे तो अनकहा दर्द ही देखने - सुनने को मिलता है। जिनके लिए त्योहार खुशियां नहीं बल्कि चिंता और विषाद का संदेश लेकर आने लगा है। जो जिंदगी से हैरान - परेशान हैं। बेचैनी में मैने टेलीविजन बंद कर दिया और अखबार के पन्ने पलटने लगा। लेकिन यहां भी किसी न किसी बहाने अनकही कहानी का बखान - चर्चा। हालांकि भीतर के पन्ने पर एक छोटी सी खबर पर निगाह रुक गई। खबर बिल्कुल सामान्य थी।एक बड़े शहर के व्यवसायी का शव कस्बे के लॉज में फंदे से लटकता पाया गया। सुसाइट नोट से पुलिस इस निष्कर्ष पर पहुंची कि बंदा आर्थिक समस्याओं से परेशान था। बच्चों के लिए निवाला न जुटा पाने की बात भी उसने सुसाइट नोट में लिखी थी। साथ ही सरकार से अपने बच्चों के लिए निवाले की व्यवस्था की आखिरी मार्मिक अपील भी दुनिया छोड़ने वाले ने की थी। इस खबर ने मेरी बेचैनी और बढ़ा दी। क्योंकि त्योहारी माहौल में अखबारों में ऐसी खबरों की बाढ़ सी आ जाती है।मैं विचलित हो जाता हूं ऐसी खबरों से। क्या पता इस बार का त्योहार कैसे बीते।

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