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वर्ष: 1, अंक 6, दिसम्बर, 2016



हाइकु

अनंत आलोक


1 नग्न वृक्ष ये तप में खड़े प्रभु पत्र भेजो जी | 2 सूखी दरिया वाहन बह रहे मंजिल पाते | 3 मीन उकेरी जल पृष्ठ अपार को चित्रकार | 4 मदिरालय दो नैन भरे प्याले हम बहके | 5 आया सावन नदी नाले जवान केंचुए उगे | 6 झरना झरे दिन रात बहता पानी ठहरा | 7 मंहगे लेप बदल न सकते असली रंग | 8 फूल खिलेंगे तन की माटी पर गंगा भेंटूंगा | 9 छत गगन जिन धरा बिछोना रोज का रोना | 10 छत गगन जिन धरा बिछोना उन्हें क्या खोना | 11 बेसुध झड़ी जख्म हरे रिस्ते धरणी सड़ी | 12 उतरे घन खिलखिलाये वन हरित तन 13 नभ धरा पे जवां सरिता संग खेल रहा है | 14 रेंगती नदी अजगर विशाल निगले सब | 15 हरित गात उजले जंगलात नवीन पात | 16 कुसुम हँसे इश्क मजाज कीट पतंग फंसे | 17 सावन भर मेघ जी भर रोये काजल धोये | 18 फसल फली मरकट मयूर हिरणी पली | 19 आग का गोला पीठ पहाड़ पर चढ़ के बोला | 20 कंठ संगीत हृदय विद्या वास ज्ञान उज्जास | 21 चौमासा आये श्वान ढोल बजाते झींगुर गाए | 22 तारे गुम परदे में चाँद निशा उदास | 23 बहके पाँव अजनबी ठहरा मन के गाँव | 24 भेंड़े चरती नील गगन पर चाँद चराता | 25 बोझ अपार जहाज रेगिस्तान मालिक दीन | 26 कंठ चटके पिघलता है तन नीर ठोस दो | 27 पुष्प कंटीला प्रसव चट्टान का रावण मारा | 28 उजाड़े घर हम जानवर हैं मेहमां तेरे | 29 टूटते तारे निशा की छाती पर असंख्य तारे | 30 पुस्तक साथी अंत समय तक प्रेम निभाती |
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