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वर्ष: 1, अंक 6, दिसम्बर, 2016



नवगीत

सरस्वती माथुर


नाव चली यादों की डूबे किनारे साहिल को छूकर दूर हुअे धारे काग़ज़ की नाव सा मौसम जो आया हवाओं के सागर में मन बहाया विगत की नदियों के मीठे लगे झारे भीगे हुअे मन को मौसम सँवारे झर रहे मेघों को बूँदे बुहारे भोर में ढल गये रातों के तारे अतीत के द्वारे पर हम हैं बंजारे ।
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