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वर्ष: 1, अंक 6, दिसम्बर, 2016



मोतिया के शंख !

सरस्वती माथुर


झरे मोगरे खुशबू लुट गयी मोती खंगोरते टूट गए बेला के उड़ान भरते पंख मन धरा पर छितरे मोतिया के शंख यादों की फुहारों में मन वीणा झकझोरते लुटेरी हवाओं ने बदले तेवर तो छूट गया साथ मोगरे का पी गये रस थामें किसका हाथ मन के जख्म कुरेरते दूर तलक सन्नाटे करते जीवन को नीरस सपने अंजोरते
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